Friday, May 25, 2018

                          श्री अभ्या आंजनया हनुमान मंदिर डोभी जौनपुर: 


इस सिद्ध पीठ पर सच्चे मन से की गई #प्रार्थना फलित होती है। इस मन्दिर के मुख्य द्वार पर यह #महामन्त्र अंकित है --
महाज्ञान स्वरूपी च हनुमान अंजना सुतः !
कालज्ञान स्वरूपी च हनुमान राम भक्तः !
ब्रह्मज्ञान स्वरूपी च हनुमान वायु सुतः !
नमामि कपीशम, शरणं शरणं शरणं !
राम भक्ता शरणं ममा !
श्री हनुमान मन्दिर, क़र्रा कॉलेज, डोभी, जौनपुर एक सिद्धि पीठ है।
यहाँ सच्चे मन से की गई प्रार्थना फलित होती है।














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Thursday, July 21, 2016

सावन, सोमवार, शिवलिंग और महादेव की महिमा


सावन का महीना और भगवान शंकर यानी भक्ति की ऐसी अविरल धारा जहां हर हर महादेव और बम बम भोल की गूंज से कष्टों का निवारण होता है, मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यूं तो भगवान शंकर की पूजा के लिए सोमवार का दिन पुराणों में निर्धारित किया गया है। लेकिन पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन महाशिवरात्रि, उसके बाद सावन के महीने में आनेवाला प्रत्येक सोमवार, फिर हर महीने आनेवाली शिवरात्रि और सोमवार का महत्व है। लेकिन भगवान को सावन यानी श्रावण का महीना बेहद प्रिय है जिसमें वह अपने भक्तों पर अतिशय कृपा बरसाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस महीने में खासकर सोमवार के दिन व्रत-उपवास और पूजा पाठ (रुद्राभिषेक,कवच पाठ,जाप इत्यादि) का विशेष लाभ होता है। सनातन धर्म में यह महीना बेहद पवित्र माना जाता है यही वजह है कि मांसाहार करने वाले लोग भी इस मास में मांस का परित्याग कर देते है।
सावन के महीने में सोमवार महत्वपूर्ण होता है। सोमवार का अंक 2 (पहला रविवार और दूसरा सोमवार) होता है जो चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। चन्द्रमा मन का संकेतक है और वह भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। चंद्रमा मनसो जात: यानी चंद्रमा मन का मालिक है और उसके नियंत्रण और नियमण में उसका (चंद्रमा का) अहम योगदान है। यानी भगवान शंकर शिव के मस्तक पर चंद्रमा को नियंत्रित कर उक्त साधक या भक्त के मन को एकाग्रचित कर उसे अविद्या रुपी माया के मोहपाश से मुक्त कर देते हैं। भगवान शंकर की कृपा से भक्त त्रिगुणातीत (सत, रज और तम गुण) भाव को प्राप्त करता है और यही उसके जन्म-मरण से मुक्ति का आधार बनता है।
सावन के महीने में सबसे अधिक बारिश होती है जो शिव के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करती है। भगवान शंकर ने स्वयं सनतकुमारों को सावन महीने की महिमा बताई है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, बांये चन्द्र और अग्नि मध्य नेत्र है। जब सूर्य कर्क राशि में गोचर करता है, तब सावन महीने की शुरुआत होती है। सूर्य गर्म है जो उष्मा देता है जबकि चंद्रमा ठंडा है जो शीतलता प्रदान करता है। इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिस होती है। जिससे  लोक कल्याण के लिए विष को पीने वाले भोले को ठंडक व सुकून मिलता है। इसलिए शिव का सावन से इतना गहरा लगाव है।
सावन और साधना के बीच चंचल और अति चलायमान मन की एकाग्रता एक अहम कड़ी है जिसके बिना परम तत्व की प्राप्ति असंभव है। साधक की साधना जब शुरू होती है तब मन एक विकराल बाधा बनकर खड़ा हो जाता है। उसे नियंत्रित करना सहज नहीं होता। लिहाजा मन को ही साधने में साधक को लंबा और धैर्य का सफर तय करना होता है। इसलिए कहा गया है कि मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। यानी मन से ही मुक्ति है और हम ही बंधन का कारण है। भगवान शंकर ने मस्तक में ही चंद्रमा को दृढ कर रखा है लिहाजा साधक की साधना निर्विघ्न संपन्न होती चली जाती है।
यजुर्वेद के एक मंत्र में मन को बड़ा ही प्रबल और चंचल कहा गया है। मन जड़ होते हुए भी सोते-जागते कभी भी चैन नहीं लेता। जितनी देर हम जागते रहते हैं, उतनी देर यह कुछ न कुछ सोचता हुआ भटकता रहता है। मन की इसी अस्थिर गति को थामने और दृढ करने के लिए भगवान शंकर हमें सावन जैसा मास प्रदान करते हैं। इसी सावन में साधना हर बाधाओं को पार कर आगे बढ़ती है। सावन,सोमवार और भगवान शंकर की अराधना सर्वथा कल्याणकारी है जिसमें भक्त मनोवांछित फर प्राप्त करते हैं।
शिव (शि-व) मंत्र में एक अंश उसे ऊर्जा देता है और दूसरा उसे संतुलित करता है। इसलिए जब हम ‘शिव’ कहते हैं, तो हम ऊर्जा को एक खास तरीके से, एक खास दिशा में निर्देशित करने की बात करते हैं। 'शिवम' में यह ऊर्जा अनंत स्वरुप का रुप धारण करती है। 'ऊं नम: शिवाय' का महामंत्र भगवान शंकर की उस उर्जा को नमन है जहां शक्ति अपने सर्वोच्च रूप में आध्यात्मिक किरणों से भक्तों के मन-मस्तिष्क को संचालित करती है। जीवन के भव-ताप से दूर कर भक्ति को प्रगाढ़ करते हुए सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से मुक्त कर मानसिक और शारीरिक रूप में विकार रहित स्वरूप प्रदान करती है। यह स्वरूप निर्विकार होता है जो परमब्रह्म से साक्षात्कार का रास्ता तय कराता है।
'शिव' शब्द की उत्पत्ति वश कान्तौ धातु से हुई हैं। जिसका मतलब जिसको सब चाहें वही शिव। जीवन में सभी आनंद की इच्छा करते हैं यानी शिव का एक अर्थ आंनद भी है। 'शिव' का एक अर्थ - 'कल्याणकारी' भी है। शिव यानी जो सबको प्यारा।
भगवान शंकर यूं तो अराधना से प्रसन्न होते हैं लेकिन सावन मास में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक का बड़ा महत्व है। वेद मंत्रों के साथ भगवान शंकर को जलधारा अर्पित करना साधक के आध्यात्मिक जीवन के लिए महाऔषधि के सामान है। पांच तत्व में जल तत्व बहुत महत्वपूर्ण है। पुराणों ने शिव के अभिषेक को बहुत पवित्र महत्व बताया गया है।
जल में भगवान विष्णु का वास है, जल का एक नाम 'नार' भी है। इसीलिए भगवान विष्णु को नारायण कहते हैं। जल से ही धरती का ताप दूर होता है। जो भक्त, श्रद्धालु भगवान शिव को जल चढ़ाते हैं उनके रोग-शोक, दुःख दरिद्र सभी नष्ट हो जाते हैं। भगवान शंकर को महादेव इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह देव, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, मनुष्य, सभी द्वारा पूजे जाते हैं।
सावन मास में शिव भक्ति का पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो विष निकला उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसीसे उनका नाम नीलकंठ महादेव पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का खास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। शिवपुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रुप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है जिसमें कोई संशय नहीं है।
संजीवनं समस्तस्य जगतः सलिलात्मकम्‌।
भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मनः ॥
अर्थात्‌ जो जल समस्त जगत्‌ के प्राणियों में जीवन का संचार करता है वह जल स्वयं उस परमात्मा शिव का रूप है। इसीलिए जल का अपव्यय नहीं वरन्‌ उसका महत्व समझकर उसकी पूजा करना चाहिए। पुराणों में यह भी कहा गया है कि सावन के महीने में सोमवार के दिन शिवजी को एक बिल्व पत्र चढ़ाने से तीन जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। इसलिए इन दिनों शिव की उपासना का बहुत महत्व है।

आखिर क्यों हैं सावन भगवान शिव का प्रिय महीना?

ऐसी मान्यता है कि प्रबोधनी एकादशी से सृष्टि के पालन कर्ता भगवान विष्णु सारी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपने दिव्य भवन पाताललोक में विश्राम करने के निकल लेते है और अपना सारा कार्यभार अपने समकक्ष मस्त-मौला अवघड़ बाबा महादेव को सौंप देते है। भगवान भूतनाथ गौरा पार्वती के साथ पृथ्वी लोक पर विराजमान रहकर पृथ्वी वासियों के दुःख दर्द को समझते है एंव उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण करते है।
शिव को सावन ही क्यों प्रिय है ?
महादेव को श्रावण मास वर्ष का सबसे प्रिय महीना लगता है। क्योंकि श्रावण मास में सबसे अधिक वर्षा होने के आसार रहते है, जो शिव के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करती एंव हमारी कृषि के लिए भी अत्यन्त लाभकारी है। भगवान शंकर ने स्वयं सनतकुमारों को सावन महीने की महिमा बताई है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, बांये चन्द्र और अग्नि मध्य नेत्र है। हिन्दू कैलेण्डर में महीनों के नाम नक्षत्रों के आधार पर रखें गयें है।
जैसे वर्ष का पहला माह चैत्र होता है, जो चित्रा नक्षत्र के आधार पर पड़ा है, उसी प्रकार श्रावण महीना श्रवण नक्षत्र के आधार पर रखा गया है। श्रवण नक्षत्र का स्वामी चन्द्र होता है। चन्द्र भगवान भोले नाथ के मस्तक पर विराज मान है। जब सूर्य कर्क राशि में गोचर करता है, तब सावन महीना प्रारम्भ होता है। सूर्य गर्म है एंव चन्द्र ठण्डक प्रदान करता है, इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिस होती है। जिसके फलस्वरूप लोक कल्याण के लिए विष को ग्रहण करने वाले देवों के देव महादेव को ठण्डक व सुकून मिलता है। शायद यही कारण है कि शिव का सावन से इतना गहरा लगाव है।

Saturday, September 12, 2015

jai hanuman

प्राचीन भारत के 5 महान 'बाहुबली'

भारतवर्ष में पहले देव, असुर, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, मानव, नाग आदि जातियां निवास करती थीं। कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरांतदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, संधव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते थे। भारत के पूर्वी भाग में किरात (चीनी) और पश्चिमी भाग में यवन (अरबी) बसे हुए थे। उस काल में एक से बढ़कर एक बाहुबली होते थे, लेकिन हम उन असुरों की बात नहीं कर रहे जो अपनी मायावी शक्ति के बल पर कुछ भी कर सकते थे हम बात कर रहे हैं ऐसे लोगों की जिनकी भुजाओं में अपार बल था।
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बाहुबली का अर्थ होता है जिसकी भुजाओं में अपार बल है। बलवान, शक्तिमान और ताकतवर। दुनिया में आज भी ऐसे कई व्यक्ति है जिनकी भुजाओं में इतना बल है जितना कि किसी सामान्य इंसान या किसी कसरत करने वाले व्यक्ति की भुजाओं में भी नहीं होगा।
 
हम महाबली शेरा, महाबली खली, महाबली सतपाल या दारासिंह की बात नहीं कर रहे हैं। हम आपको बताएंगे भारत के प्राचीनकाल में ऐसे कौन-कौन से व्यक्ति थे जिनकी भुजाओं में आम इंसान की अपेक्षा कहीं ज्यादा बल था। 

प्राचीन भारत के 5 महान 'बाहुबली'

भारतवर्ष में पहले देव, असुर, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, मानव, नाग आदि जातियां निवास करती थीं। कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरांतदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, संधव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते थे। भारत के पूर्वी भाग में किरात (चीनी) और पश्चिमी भाग में यवन (अरबी) बसे हुए थे। उस काल में एक से बढ़कर एक बाहुबली होते थे, लेकिन हम उन असुरों की बात नहीं कर रहे जो अपनी मायावी शक्ति के बल पर कुछ भी कर सकते थे हम बात कर रहे हैं ऐसे लोगों की जिनकी भुजाओं में अपार बल था।
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बाहुबली का अर्थ होता है जिसकी भुजाओं में अपार बल है। बलवान, शक्तिमान और ताकतवर। दुनिया में आज भी ऐसे कई व्यक्ति है जिनकी भुजाओं में इतना बल है जितना कि किसी सामान्य इंसान या किसी कसरत करने वाले व्यक्ति की भुजाओं में भी नहीं होगा।
 
हम महाबली शेरा, महाबली खली, महाबली सतपाल या दारासिंह की बात नहीं कर रहे हैं। हम आपको बताएंगे भारत के प्राचीनकाल में ऐसे कौन-कौन से व्यक्ति थे जिनकी भुजाओं में आम इंसान की अपेक्षा कहीं ज्यादा बल था। 

प्राचीन भारत के 5 महान 'बाहुबली'

भारतवर्ष में पहले देव, असुर, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, मानव, नाग आदि जातियां निवास करती थीं। कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरांतदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, संधव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते थे। भारत के पूर्वी भाग में किरात (चीनी) और पश्चिमी भाग में यवन (अरबी) बसे हुए थे। उस काल में एक से बढ़कर एक बाहुबली होते थे, लेकिन हम उन असुरों की बात नहीं कर रहे जो अपनी मायावी शक्ति के बल पर कुछ भी कर सकते थे हम बात कर रहे हैं ऐसे लोगों की जिनकी भुजाओं में अपार बल था।
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बाहुबली का अर्थ होता है जिसकी भुजाओं में अपार बल है। बलवान, शक्तिमान और ताकतवर। दुनिया में आज भी ऐसे कई व्यक्ति है जिनकी भुजाओं में इतना बल है जितना कि किसी सामान्य इंसान या किसी कसरत करने वाले व्यक्ति की भुजाओं में भी नहीं होगा।
 
हम महाबली शेरा, महाबली खली, महाबली सतपाल या दारासिंह की बात नहीं कर रहे हैं। हम आपको बताएंगे भारत के प्राचीनकाल में ऐसे कौन-कौन से व्यक्ति थे जिनकी भुजाओं में आम इंसान की अपेक्षा कहीं ज्यादा बश्रीहनुमानजी : जब ताकत की, बल की या शक्ति की बात हो तो हनुमानजी का नाम सबसे पहले रखा जाता है। श्रीरामदूत हनुमानजी की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने संजीवनी बूटी का एक पहाड़ उठा लिया था।
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श्रीरामदूत हनुमानजी के बारे में क्या कहें? उनके पराक्रम और बाहुबल के बारे में रामायण सहित दुनिया के हजारों ग्रंथों में लिखा हुआ है। केसरीनंदन पवनपुत्र श्रीहनुमानजी को भगवान शंकर का अंशशवतार माना जाता है।ल था। 

Tuesday, September 1, 2015

लव मै‍रिज के इच्छुक युवा पढ़ें श्रीकृष्ण ये सरल मंत्र
श्रीकृष्ण के यह मंत्र कराएंगे आपकी सफल लव-मैरिज
* शादी योग्य युवाओं के लिए श्रीकृष्ण के सरल मंत्र
श्रीकृष्‍ण का मंत्र : - क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वा







हा।'

SEP FESTIVAL

इस वर्ष के व्रत-त्योहार (2015)
सितंबर माह के त्योहार
दिऩांक प्रमुख त्योहार अन्य त्योहार हिंदी माह पक्ष तिथि
1 सितंबर गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा.8.29), पंचक कज्जली तीज, बहुला चौथ भाद्रपद कृष्ण तृतीया (3)
2 सितंबर पंचक स. (दिन 10.8 तक) भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी (4)
3 सितंबर गोगा पंचमी भाद्रपद कृष्ण पंचमी (5)
4 सितंबर हलषष्ठी व्रत हरछठ व्रत, दादाभाई नौरोजी ज. भाद्रपद कृष्ण षष्ठी (6)
5 सितंबर श्रीकृष्‍ण जन्माष्टमी (स्मार्त) डॉ. राधाकृष्णन ज., शिक्षक दिवस भाद्रपद कृष्ण सप्तमी (7)
6 सितंबर श्रीकृष्‍ण जन्माष्टमी (वैष्णव) महर्षि दधीचि ज. भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (8)
7 सितंबर गोगा नवमी भाद्रपद कृष्ण नवमी (9)
8 सितंबर व्यतिपात विश्व साक्षरता दि. भाद्रपद कृष्ण दशमी (10)
9 सितंबर जया (अजा) एकादशी (सर्वे), पुष्य नक्षत्र (प्रात: 6.7 से) गोवत्स द्वादशी, बछ बारस, ओम द्वादशी भाद्रपद कृष्ण एकादशी (11)
10 सितंबर प्रदोष व्रत, श्वेतां. पर्युषण प्रा., विश्नोई बलि. दि. पुष्य नक्षत्र (प्रात: 7.18 तक), गोविंद वल्लभपंत ज. भाद्रपद कृष्ण द्वादशी (12)
11 सितंबर शिव चतुर्दशी विनोबा भावे ज. भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी (13)
12 सितंबर श्राद्ध अमावस्या कुशोत्पाटिनी अमावस्या, पोला पिठोरा भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी (14)
13 सितंबर स्ना.दा. अमावस्या, ब्रह्मानंद लोधी नि.दि. कुंभ मुख्य स्नान (नासिक) भाद्रपद कृष्ण अमावस्या (15)
14 सितंबर चंद्रदर्शन, महावीर जन्मवाचन हिन्दी दिवस, महादेवी वर्मा ज. भाद्रपद शुक्ल एकम (1)
15 सितंबर अभियंता दिवस जिल्हेज मास प्रा. भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (2)
16 सितंबर हरितालिका तीज, रोटतीज चंद्रदर्शन निषेध, चौथ चंद्र भाद्रपद शुक्ल तृतीया (3)
17 सितंबर गणेश जयंती (स्थापना) गणेश चतुर्थी (चं.अ.रा.8.15), विश्वकर्मा पूजा भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (4)
18 सितंबर ऋषि पंचमी, दसलक्षण, सौर मा. आश्विन प्रा. दि. जैन पर्युषण पर्व प्रा. भाद्रपद शुक्ल पंचमी (5)
19 सितंबर सूर्य षष्‍ठी, चंपा षष्ठी मोरयाई छठ भाद्रपद शुक्ल षष्ठी (6)
20 सितंबर संतान सातें, शील सप्तमी नवाखाई पर्व भाद्रपद शुक्ल सप्तमी (7)
21 सितंबर महालक्ष्मी व्रत प्रा. राधाष्टमी, दुर्वाष्टमी भाद्रपद शुक्ल अष्टमी (8)
22 सितंबर भाद्रपद शुक्ल नवमी (9)
23 सितंबर सुगंध दशमी, ईद-उल-अदहा धूप खेवन पर्व भाद्रपद शुक्ल दशमी (10)
24 सितंबर पद्मा-परिवर्तनी एकादशी (सर्वे) डोल ग्यारस, बकरीद भाद्रपद शुक्ल एकादशी (11)
25 सितंबर् श्रवण द्वादशी, ओणम पर्व, पं. दीनदयाल ज. प्रदोष व्रत, पंचक ‍(दिन 1.47 से), वामन ज. भाद्रपद शुक्ल द्वादशी (12)
26 सितंबर अनंत चतुर्दशी (मतांतर) पंचक, चतुर्दशी व्रत भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी (13)
27 सितंबर अनंत चतुर्दशी, पयुर्षण स., पूर्णिमा व्रत, विश्व पर्यटन दि. पंचक, गणेश विसर्जन, राजाराम मोहन राय पु. भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (14)
28 सितंबर प्रतिपदा श्राद्ध, श्राद्ध महालय प्रा., भगतसिंह ज. क्षमावाणी, पंचक, स्ना.दा. पूर्णिमा भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (15)
29 सितंबर द्वितीया श्राद्ध, पंचक (शाम 6.7 तक) षोडशकारण व्रत पूर्ण, विश्व ह्रदय दि. आश्विन कृष्ण एकम-द्वितीया (1-2)
30 सितंबर तृतीया श्राद्ध बैंक अर्द्धवार्षिक लेखाबं

Monday, August 31, 2015

महामृत्युञ्जय 

महामृत्युञ्जय मंत्र यजुर्वेद के रूद्र अध्याय स्थित एक मंत्र है। इसमें शिव की स्तुति की गयी है। शिव को 'मृत्यु को जीतने वाला' माना जाता है। मंत्र इस प्रकार है -
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
यह श्लोक यजुर्वेद (TS 1.8.6.i; VS 3.60) में भी आता है।महामृत्युंजय मंत्र ( संस्कृतमहामृत्युंजय मंत्र,Mahāmṛtyuṃjaya Mantra "मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र") जिसे त्रयंबकम मंत्र) भी कहा जाता है, ऋग्वेद का एक श्लोक है (RV 7.59.12). यह त्रयंबक "त्रिनेत्रों वाला", रुद्र का विशेषण जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया, को संबोधित है।
गायत्री मंत्र के साथ यह समकालीन हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है।
मंत्र इस प्रकार है (IAST लिप्यंतरण):
tryambakaṃ yajāmahe sugandhiṃ puṣṭi-vardhanam
urvārukam iva bandhanān mṛtyor mukṣīya māmṛtāt
शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है।
इसे मृत्यु पर विजय पाने वाला महा मृत्युंजय मंत्र कहा जाता है। इस मंत्र के कई नाम और रूप हैं। इसे शिव के उग्र पहलू की ओर संकेत करते हुए रुद्र मंत्र कहा जाता है; शिव के तीन आँखों की ओर इशारा करते हुए त्रयंबकम मंत्र और इसे कभी कभी मृत-संजीवनी मंत्र के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह कठोर तपस्या पूरी करने के बाद पुरातन ऋषि शुक्र को प्रदान की गई "जीवन बहाल" करने वाली विद्या का एक घटक है।
ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय कहा है। चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ
  • त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक)
  • यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय
  • सुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
  • पुष्टि = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
  • वर्धनम = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली
  • उर्वारुकम= ककड़ी (कर्मकारक)
  • इव= जैसे, इस तरह
  • बंधना= तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
  • मृत्युर = मृत्यु से
  • मुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
  • मा= न
  • अमृतात= अमरता, मोक्ष

सरल अनुवाद

हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है। ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग ("मुक्त") हों, अमरत्व से नहीं बल्कि मृत्यु से हों.

संदर्भ

बाह्य लिंक[


महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव
बड़ी तपस्या से ऋषि मृकण्ड के पुत्र हुआ। कितु ज्योतिर्विदों ने उस शिशु के लक्षण देखकर ऋषि के हर्ष को चिंता में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने कहा यह बालक अल्पायु है। इसकी आयु केवल बारह वर्ष है। मृकण्ड ऋषि ने अपनी पत्नी को आश्वत किया-देवी, चिंता मत करो। विधाता जीव के कर्मानुसार ही आयु दे सकते हैं, कितु मेरे स्वामी समर्थ हैं। भाग्यलिपि को स्वेच्छानुसार परिवर्तित कर देना भगवान शिव के लिए विनोद मात्र है। ऋषि मृकण्ड के पुत्र मार्कण्डेय बढऩे लगे। शैशव बीता और कुमारावस्था के प्रारंभ में ही पिता ने उन्हें शिव मंत्र की दीक्षा तथा शिवार्चना की शिक्षा दी। पुत्र को उसका भविष्य बता•र समझा दिया कि पुरारि ही उसे मृत्यु से बचा सकते हैं। माता-पिता तो दिन गिन रहे थे। बारह वर्ष आज पूरे होंगे। मार्कण्डेय मंदिर में बैठे थे। रात्रि से ही और उन्होंने मृत्युंजय मंत्र की शरण ले रखी है- त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धन्म। उर्वारुकमिव बन्धनामृत्येर्मुक्षीय मामृतात्। सप्रणव बीजत्रय-सम्पुटित महामृत्युंजय मंत्र चल रहा था। काल किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। यमराज के दूत समय पर आए और संयमनी लौट गए। उन्होंने अपने स्वामी यमराज से जाकर निवेदन किया- हम मार्•ण्डेय तक पहुंचने का साहस नहीं पाए। इस पर यमराज ने कहा कि मृकण्ड को पुत्र को मैं स्वयं लाऊंगा। दण्डधर यमराज जी महिषारूढ़ हुए और क्षण भर में मार्कण्डेय के पास पहुंच गए। बालक मार्कण्डेय ने उन कज्जल कृष्ण, रक्तनेत्र पाशधारी को देखा तो सम्मुख की लिंगमूर्ति से लिपट गया। हुम्, एक अद्भुत अपूर्व हुंकार और मंदिर, दिशाएं जैसे प्रचण्ड प्रकाश से चकाचौंथ हो गईं। शिवलिंग से तेजोमय त्रिनेत्र गंगाधर चन्द्रशेखर प्रकट हो गए थे और उन्होंने त्रिशूल उठा लिया था और यमराज से कहा कि तुम मेरे आश्रित पर पाश उठाने का साहस केसे करते हो?। यमराज ने डांट पडऩे से पूर्व ही हाथ जोडक़र मस्तक झुका लिया था और कहा कि मैं आप का सेवक हूं। कर्मानुसार जीव को इस लोक से ले जाने का निष्ठुर कार्य प्रभु ने इस सेवक को दिया है। भगवान चंद्रशेखर ने कहा कि यह संयमनी नहीं जाएगा। इसे मैंने अमरत्व दिया है। मृत्युंजय प्रभु की आज्ञा को यमराज अस्वीकार केसे कर सकते थे? यमराज खाली हाथ लौट गए। मार्कण्डेय ने यह देख लिया। उर्वारु•मिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। वृन्तच्युत खरबूजे के समान मृत्यु के बन्धन से छुड़ाकर मुझे अमृतत्व प्रदान करें। मंत्र के द्वारा चाहा गया वरदान उस का सम्पूर्ण रूप से उसी समय मार्कण्डेय को प्राप्त हो गया। भाग्यलेख-वह औरों के लिए अमित होगा, कितु आशुतोष के आश्रितों के लिए भाग्येलख क्या? भगवान ब्रह्मा भाग्यविधाता स्वयं भगवती पार्वती से कहते हैं- बावरो रावरो नाह भवानी।
||महा मृत्‍युंजय मंत्र ||||महा मृत्‍युंजय मंत्र ||
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!
||महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ || समस्‍त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।
महामृत्युंजय मंत्र के वर्णो (अक्षरों) का अर्थ महामृत्युंघजय मंत्र के वर्ण पद वाक्यक चरण आधी ऋचा और सम्पुतर्ण ऋचा-इन छ: अंगों के अलग-अलग अभिप्राय हैं।
ओम त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठर के अनुसार 33 देवताआं के घोतक हैं। उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं। इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं। साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है। महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है। भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।
त्रि – ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
यम – अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।
ब – सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
कम – जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
य – वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
म – प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे – प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि – अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
व – पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध – भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् – कपाली रुद्र का घोतक है। उरु मूल में स्थित है।
उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है। यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा – स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
रु – भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
क – धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि – अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
व – मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
ब – वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
न्धा – अंशु आदित्यद का घोतक है। वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् – भगादित्यअ का बोधक है। वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ – विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।
र्त्यो् – दन्दाददित्य् का बोधक है। वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
मु – पूषादित्यं का बोधक है। पृष्ठै भगा में स्थित है।
क्षी – पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है। नाभि स्थिल में स्थित है।
य – त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है। गुहय भाग में स्थित है।
मां – विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
मृ – प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
तात् – अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।
उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं। जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग – अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं) उनकी रक्षा होती है।
मंत्रगत पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं। उसी प्रकार अलग – अल पदों की भी शक्तियाँ है।
त्र्यम्‍‍बकम् – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है।
यजा- सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है।
महे- माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
सुगन्धिम् – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
पुष्टि – पुरन्दिरी शकित का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
वर्धनम – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।
उर्वा – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है।
रुक – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।
बन्धानात् – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।
मृत्यो: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
मुक्षीय – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।
मा – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है।
अमृतात – अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।
महामृत्युजय प्रयोग के लाभ
कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम्।
येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।
स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।
मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।
देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।
यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित।।
जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत्।
कलियुग में केवल शिवजी की पूजा फल देने वाली है। समस्तं पापं एवं दु:ख भय शोक आदि का हरण करने के लिए महामृत्युजय की विधि ही श्रेष्ठ है। निम्निलिखित प्रयोजनों में महामृत्युजंय का पाठ करना महान लाभकारी एवं कल्याणकारी होता है